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पुण्य-सलिला शिप्रा तट पर स्थित भारत की महाभागा अनादि नगरी उज्जयिनी को भारत राष्ट्र की सांस्कृतिक काया का मणिपूर चक्र माना गया है। इसे भारत की मोक्षदायिका सप्त प्राचीन पुरियों में एक माना गया है। प्राचीन विश्व की याम्योत्तार ;शून्य देशान्तरध्द रेखा यहीं से गुजरती थी। विभिन्न नामों से इसकी महिमा गाई गयी है। महाकवि कालिदास द्वारा वर्णित ''श्री विशाला-विशाला'' नगरी तथा भाणों में उल्लिखित ''सार्वभौम'' नगरी यही रही है। इस नगरी से ऋषि सांदीपनि, महाकात्यायन, भास, भर्तृहरि, कालिदास- वराहमिहिर- अमरसिंहादि नवरत्न, परमार्थ, शूद्रक, बाणभट्ट, मयूर, राजशेखर, पुष्पदन्त, हरिषेण, शंकराचार्य, वल्लभाचार्य, जदरूप आदि संस्कृति-चेता महापुरुषों का घनीभूत संबंध रहा है। वृष्णि-वीर कृष्ण-बलराम, चण्डप्रद्योत, वत्सराज उदयन, मौर्य राज्यपाल अशोक सम्राट् सम्प्रति, राजा विक्रमादित्य, महाक्षत्रप चष्टन व रुद्रदामन, परमार नरेश वाक्पति मुंजराज, भोजदेव व उदयादित्य, आमेर नरेश सवाई जयसिंह, महादजी शिन्दे जैसे महान् शासकों का राजनैतिक संस्पर्श इस नगरी को प्राप्त हुआ है। मुगल सम्राट् अकबर, जहाँगीर व शाहजहाँ की भी यह चहेती विश्राम-स्थली रही है।पुण्य-सलिला शिप्रा तट पर बसी अवन्तिका अनेक तीर्थों की नगरी है। इन तीर्थों पर स्नान, दान, तर्पण, श्राध्द आदि का नियमित क्रम चलता रहता है। ये तीर्थ सप्तसागरों, तड़ागों, कुण्डों, वापियों एवं शिप्रा की अनेक सहायक नदियों पर स्थित रहे हैं। शिप्रा के मनोरम तट पर अनेक दर्शनीय व विशाल घाट इन तीर्थ-स्थलों पर विद्यमान है जिनमें त्रिवेणी-संगम, गोतीर्थ, नृसिंह तीर्थ, पिशाचमोचन तीर्थ, हरिहर तीर्थ, केदार तीर्थ, प्रयाग तीर्थ, ओखर तीर्थ, भैरव तीर्थ, गंगा तीर्थ, मंदाकिनी तीर्थ, सिध्द तीर्थ आदि विशेष उल्लेखनीय है। प्रत्येक बारह वर्षों में यहाँ के सिंहस्थ मेले के अवसर पर लाखों साधु व यात्री स्नान करते हैं।